वैश्विक अर्थव्यवस्था में हलचल:
Global Debt Crisis की काली छाया जब दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्तियों को अपनी गिरफ्त में ले रही है, तब एक देश ऐसा भी है जो सभी अनुमानों को गलत साबित कर खड़ा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अपनी अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट में साफ कर दिया है कि जहां अमेरिका और चीन के लिए बढ़ता सार्वजनिक कर्ज खतरे की घंटी बन चुका है, वहीं भारत की स्थिति पूरी तरह से एक सकारात्मक अपवाद बनकर उभरी है।
खतरे के निशान पर वैश्विक कर्ज:
आईएमएफ की ‘विश्व आर्थिक परिदृश्य’ और ‘फिस्कल मॉनिटर’ रिपोर्ट बताती है कि दुनिया का औसत सार्वजनिक कर्ज अब जीडीपी के 100 प्रतिशत के करीब जा पहुंचा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार कर्ज का दायरा इस भयावह स्तर तक बढ़ा है और साल 2030 तक इसके 100 फीसद को भी पार कर जाने की गंभीर आशंका है।
महाशक्तियों पर गहराता संकट:
अमेरिका और अन्य जी-7 देशों में सरकारी बॉन्ड्स पर बढ़ती ब्याज दरों ने वित्तीय दबाव को कई गुना बढ़ा दिया है। अमेरिका और चीन लगातार बड़े राजकोषीय घाटों के साथ कर्ज का बोझ उठा रहे हैं, जिसके चलते आईएमएफ ने वैश्विक स्तर पर वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए खर्चों में तत्काल कटौती और कड़े कदम उठाने की अपील की है।
Global Debt Crisis के बीच भारत का सुरक्षा कवच
आर्थिक रफ्तार बनी ढाल:
Global Debt Crisis के दौर में भारत के सुरक्षित रहने का सबसे बड़ा आधार उसकी तेज जीडीपी ग्रोथ रेट है। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 और 2027-28 में भारत की अनुमानित विकास दर 7 प्रतिशत रहने की उम्मीद है, जो विश्व की सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति को दर्शाती है।
घरेलू मुद्रा का बड़ा सहारा:
भारत का कुल बाहरी कर्ज जीडीपी के महज 19 प्रतिशत के करीब है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि भारत पर विदेशी मुद्रा विनिमय और अल्पकालिक भुगतान का कोई भारी जोखिम नहीं है। कर्ज का बड़ा हिस्सा घरेलू मुद्रा यानी रुपये में मौजूद होने के कारण देश अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के उतार-चढ़ाव से पूरी तरह सुरक्षित है।
कर्ज के आंकड़ों में सुधार का खाका:
आईएमएफ के आंकड़ों के मुताबिक, भारत का समग्र कर्ज 2026 में जीडीपी का करीब 83.1 प्रतिशत है, जो रणनीतिक कदमों के चलते 2031 तक घटकर 75.1 प्रतिशत पर आ जाएगा। केंद्र सरकार राजकोषीय संतुलन साधने को लेकर लगातार सक्रिय है और चालू राजकोषीय घाटे को 4.3 से 4.4 प्रतिशत के दायरे से और नीचे लाने के लिए प्रतिबद्ध है।
सतर्कता और भविष्य की चुनौतियां:
Global Debt Crisis के इस नाजुक दौर में राजस्व का एक बड़ा हिस्सा ब्याज भुगतान में जाने के कारण सावधानी बरतनी अभी भी अनिवार्य है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, राज्य सरकारों को अपने खजाना प्रबंधन और लोकलुभावन योजनाओं पर होने वाले अनाप-शनाप खर्च को नियंत्रित करने की सख्त जरूरत बनी रहेगी।






