दहशत और इंतकाम का वो खौफनाक मंजर: Prem Granth Climax की शुरुआत उस सनसनीखेज सन्नाटे से होती है जहां जलती लपटों के बीच न्याय और प्रतिशोध की अंतिम लड़ाई लड़ी गई थी। साल 1996 में रिलीज हुई निर्देशक राजीव कपूर की यह फिल्म सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं बल्कि सामाजिक कुरीतियों पर सीधा वार थी। बॉलीवुड की धक-धक गर्ल माधुरी दीक्षित और दिवंगत अभिनेता ऋषि कपूर की अदाकारी ने इस कहानी को अमर बना दिया।
साजिश की आग में झुलसी एक बेबस जिंदगी: कहानी गांव की एक बेहद सीधी-साधी लड़की कजरी (माधुरी दीक्षित) के चारों तरफ घूमती है जिसे ऊंची जाति के सोमनाथ (ऋषि कपूर) से प्यार हो जाता है। कजरी की हंसती-खेलती दुनिया में तब अचानक खौफनाक अंधेरा छा गया जब गांव के एक ताकतवर और रसूखदार ठाकुर ने उसके साथ दुष्कर्म किया। इस अमानवीय जुर्म के बाद कजरी की जिंदगी पूरी तरह बिखर गई।
जब गुनाहगारों के साथ खड़ा हो गया समाज: उस दौर का क्रूर समाज पीड़िता को सहारा और न्याय देने के बजाय उल्टे कजरी पर ही लांछन लगाने लगा। लेकिन कजरी ने टूटने या झुकने के बजाय अपने आत्मसम्मान और इंसाफ के लिए उस व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने का फैसला किया। सोमनाथ ने भी हर मुश्किल में उसका साथ निभाकर सामाजिक दीवारों को सीधी चुनौती दी।
विजयादशमी की रात और Prem Granth Climax
दशहरे की रात बुराई का असली संहार: Prem Granth Climax को भारतीय सिनेमा के सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाले और प्रभावशाली दृश्यों में गिना जाता है। इस पूरे क्लाइमैक्स को विजयादशमी यानी दशहरे के पावन पर्व की पृष्ठभूमि पर बेहद रहस्यमयी और आक्रामक अंदाज में फिल्माया गया था। एक तरफ रामलीला मैदान में रावण का विशालकाय पुतला धू-धू कर जल रहा था तो दूसरी तरफ असली अधर्म का अंत हो रहा था।
अधर्म के प्रतीक का खौफनाक खात्मा: उस जलते हुए रावण के विशाल पुतले के सामने कजरी और सोमनाथ ने अपनी जिंदगी को बर्बाद करने वाले असली दरिंदे का वध किया। Prem Granth Climax का यह दृश्य सीधे तौर पर यह संदेश देता है कि चाहे जुल्म कितना भी बड़ा हो अंततः जीत सत्य और धर्म की ही होती है। तीस साल बाद भी यह ऐतिहासिक दृश्य आज के दर्शकों की रूह कंपा देता है।







