ग्लोबल मंच पर बड़ा टकराव: Russian Oil Imports को लेकर दुनिया भर में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव के बीच नई दिल्ली से एक ऐसा बयान सामने आया है, जिसने वाशिंगटन से लेकर यूरोप तक की कूटनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
वित्त मंत्री का सीधा संदेश: सख्त रुख के संकेत देते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक मीडिया कार्यक्रम में स्पष्ट कर दिया कि 100 प्रतिशत अमेरिकी शुल्क की आशंका के बावजूद देश अपनी रणनीतिक ऊर्जा जरूरतों से पीछे नहीं हटने वाला है।
बाजार में तूफान की आशंका: कीमतों में भारी उछाल का डर जताते हुए उन्होंने बताया कि यदि भारत रूसी आपूर्ति रोकने का ऐलान करता है, तो अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में आपूर्ति का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाएगा।
Russian Oil Imports पर भारत का आर्थिक और रणनीतिक रुख
140 करोड़ नागरिकों का हित सर्वोपरि: राष्ट्रीय सुरक्षा और जनहित को प्राथमिकता बताते हुए वित्त मंत्री ने जोर दिया कि 1.4 अरब भारतीयों के हितों की रक्षा करना सरकार का पहला कर्तव्य है, जिसके लिए हर उपलब्ध विकल्प तलाशा जाएगा।
आयात निर्भरता का कड़वा सच: कच्चे तेल की बढ़ती खपत के मामले में भारत, अमेरिका और चीन के बाद विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जहां दैनिक मांग पूरी करने के लिए वैश्विक स्रोतों पर नजर रखनी होती है।
मिडिल ईस्ट का एकाधिकार और दबाव: Russian Oil Imports बंद होने की स्थिति में भारत को मध्य पूर्व और अमेरिका पर अत्यधिक निर्भर होना पड़ेगा, जिससे खाड़ी देश तुरंत अपनी कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी कर सकते हैं।
वैश्विक अपील और ट्रंप का कानून: यूक्रेनी राष्ट्रपति के आग्रह और अमेरिका द्वारा प्रमुख तेल खरीदारों (चीन, भारत, तुर्की) पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने से जुड़ा कानून बनने के बाद अब अंतिम निर्णय अमेरिकी राष्ट्रपति के रुख पर टिका है।
भारतीय उद्योग जगत की तैयारी: Russian Oil Imports के चलते निर्यात पर खतरे के इस संवेदनशील पहलू पर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत सरकार अमेरिकी कानून के हर कानूनी व व्यापारिक पक्ष का बारीकी से अध्ययन कर रही है।






