रहस्यमयी संकट की शुरुआत: DPDP Act के खिलाफ देश के प्रमुख डिजिटल मीडिया संस्थानों ने अब शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाकर देश की निष्पक्ष पत्रकारिता के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अदालत का बड़ा हस्तक्षेप: सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की याचिका पर तुरंत संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार को औपचारिक नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है।
न्यूजरूम पर लटकती तलवार: मीडिया संगठनों ने दलील दी है कि यदि कानून के वर्तमान कड़े प्रावधान लागू रहे, तो खोजी पत्रकारिता पूरी तरह दम तोड़ देगी और गोपनीय सूत्रों की पहचान हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगी।
सबहेडिंग: DPDP Act और प्रेस की आजादी के बीच संतुलन का सवाल
पीठ की तीखी टिप्पणी: चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि स्वतंत्र प्रेस के अधिकारों और आम नागरिकों की व्यक्तिगत गोपनीयता के बीच एक ठोस रेखा खींचना बेहद आवश्यक है।
जांच से पहले मंजूरी का पेच: याचिकाकर्ताओं ने सबसे कड़ा विरोध उस प्रावधान पर जताया है, जिसके तहत किसी भी संदिग्ध मामले में खोजी रिपोर्टिंग शुरू करने से पहले उसी व्यक्ति की सहमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है।
प्री-सेंसरशिप का गहरा खतरा: वरिष्ठ वकीलों ने चेतावनी दी कि आरोपी की सहमति पर आधारित व्यवस्था असल में प्री-सेंसरशिप जैसी आपात स्थिति पैदा करेगी, जिससे DPDP Act की आड़ में बड़े खुलासे पूरी तरह दब जाएंगे।







