रहस्यमयी बजट और नई दिशा: पौराणिक फिल्मों पर लगा हजारों करोड़ का दांव क्या भारतीय बॉक्स ऑफिस का पूरा नक्शा बदलकर रख देगा? नितेश तिवारी की ‘रामायणम्’ से लेकर एसएस राजामौली की ‘वाराणसी’ तक, निर्माता अब सनातन संस्कृति की अमर गाथाओं के दम पर विश्व स्तर पर जोखिम उठाने को तैयार हैं।
ट्रेड एनालिस्ट्स का चौंकाने वाला रुख: बॉक्स ऑफिस विश्लेषक अतुल मोहन के अनुसार बॉलीवुड के घिसे-पिटे फार्मूलों से दर्शक पूरी तरह ऊब चुके हैं। ऐसे दौर में पौराणिक फिल्मों के जरिए मेकर्स को एक नया और अचूक रास्ता नजर आ रहा है, जहां हर कोई अपनी घोषणा को भव्य साबित करने में जुटा है।
वैश्विक बाजार पर सीधी नजर: वरिष्ठ विश्लेषक तरण आदर्श का स्पष्ट मानना है कि आज भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी गहरी पहचान दर्ज करानी है। ‘धुरंधर’ और ‘पुष्पा’ जैसी फिल्मों ने जिन नए विदेशी बाजारों में दस्तक दी थी, अब सनातन कथाओं वाली फिल्में उससे भी आगे निकलने का साहस जुटा रही हैं।
क्या पौराणिक फिल्मों का बजट है एक भ्रम?
4000 करोड़ का गणित और यश का बयान: अभिनेता और सह-निर्माता यश ने साफ किया है कि ‘रामायणम्’ का 4000 करोड़ का बजट दोनों भागों का संयुक्त खर्च है। हॉलीवुड की तर्ज पर इसमें वीएफएक्स, अंतरराष्ट्रीय प्रमोशन और रिलीज की विशाल लागत को एक साथ जोड़ा गया है।
तकनीक और नए प्रयोगों की दस्तक: निर्देशक हार्दिक गज्जर का तर्क है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत वीएफएक्स की मदद से निर्माण लागत को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। उनका मानना है कि पौराणिक फिल्मों में अगर कहानी सच्ची हो, तो नए कलाकारों के साथ भी कम खर्च में अविश्वसनीय सफलता हासिल की जा सकती है।
दर्शकों का अटूट भरोसा पहली शर्त: निर्माता नमित मल्होत्रा के अनुसार उनका मुख्य मकसद महज बॉक्स ऑफिस का आंकड़ा नहीं, बल्कि सनातन आस्था से जुड़े दर्शकों का दिल जीतना है। जब आस्था और सिनेमा का ऐसा संगम होता है, तो रिकॉर्ड अपने आप इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाते हैं।







