Supreme Court Bank Blacklist Lawyers मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत ने एक ऐसा मील का पत्थर फैसला सुनाया है जिसने कानूनी बिरादरी को बहुत बड़ी राहत दी है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने साफ कर दिया कि बैंक या भारतीय बैंक संघ (IBA) किसी भी वकील को उनकी व्यावसायिक राय में केवल लापरवाही के आरोप के आधार पर ‘कॉशन लिस्ट’ में डालकर ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकते।
आईबीए की कॉशन लिस्ट को बताया अवैध: शीर्ष अदालत ने मंगलवार को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आरबीआई द्वारा अनिवार्य की गई कॉशन लिस्ट का मुख्य उद्देश्य केवल बेईमान और धोखेबाज कर्जदारों पर नकेल कसना है, न कि वकीलों के पेशेवर काम की समीक्षा करना। अदालत ने बैंक एसोसिएशन द्वारा वकीलों का नाम सार्वजनिक सूची में डालने की इस पूरी प्रक्रिया को कानूनन पूरी तरह से गलत ठहराया है।
वकीलों पर कार्रवाई का हक सिर्फ बार काउंसिल को: इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एडवोकेट्स एक्ट का हवाला देते हुए याद दिलाया कि वकीलों के पेशेवर आचरण या कदाचार की जांच करने का वैधानिक अधिकार सिर्फ बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और राज्य बार काउंसिलों के पास सुरक्षित है। बैंकों या वित्तीय संस्थानों के पास वकीलों की योग्यता का आकलन करने के लिए ऐसी किसी भी प्रकार की दंडात्मक शक्तियों का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।
पैनल से हटाने की छूट, मगर सार्वजनिक घोषणा पर रोक: अदालत ने कहा कि कोई भी बैंक अपने स्तर पर किसी पैनल एडवोकेट की सेवाओं से संतुष्ट न होने पर उसे हटाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। हालांकि, बैंक का यह आंतरिक निर्णय कभी भी एक सार्वजनिक घोषणा का रूप नहीं ले सकता, क्योंकि ऐसा करने से उस वकील के पूरे करियर पर दाग लगता है और उसे अन्य जगहों पर काम मिलने के रास्ते हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं।
नेशनल लीगल एकेडमी बनाने का भी दिया निर्देश: इस ऐतिहासिक Supreme Court Bank Blacklist Lawyers फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को जजों की नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की तर्ज पर वकीलों के लिए भी एक ‘नेशनल लीगल एकेडमी’ स्थापित करने का महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। इसके अलावा, अदालत ने बीसीआई को अपने अनुशासन तंत्र की प्रभावशीलता को परखने के लिए एक व्यापक परफॉर्मेंस ऑडिट करने को भी कहा है।






