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POCSO एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अभियोजन की दलील ‘अटल सत्य’ नहीं, अदालत ने आरोपी को किया बरी

अदालत का कड़ा रुख: POCSO Act SC Verdict ने देश की न्यायिक व्यवस्था में एक गहरा सन्नाटा और नई बहस छेड़ दी है, जहां अदालत ने साफ कर दिया कि कानूनी अनुमान अभियोजन पक्ष के दावों को बिना जांचे-परखे परम सत्य नहीं बना सकते।

दोषी मानने की व्यवस्था: सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया कि कानून में भले ही अभियुक्त पर जिम्मेदारी डालने की व्यवस्था हो, लेकिन ट्रायल कोर्ट को अभियोजन की हर कहानी को आंख बंद करके स्वीकार करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

निचली अदालतों के आदेश रद: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने दिल्ली की ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा एक व्यक्ति को सुनाई गई सजा के आदेश को पूरी तरह खारिज करते हुए उसे बरी कर दिया।

POCSO Act SC Verdict: कानूनी अनुमान और वास्तविक साक्ष्य

पुरानी रंजिश का खुलासा: वर्ष 2015 में दक्षिण दिल्ली की कालकाजी झुग्गी बस्ती में एक महिला ने अपनी नाबालिग बच्ची के यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था, जबकि जांच में सामने आया कि पानी को लेकर दोनों पक्षों के बीच पुराना गंभीर विवाद चल रहा था।

गंभीर खामियों की अनदेखी: शीर्ष अदालत ने पाया कि POCSO Act SC Verdict के तहत दोनों निचली अदालतें केवल कानूनी धारणा से प्रभावित थीं और उन्होंने पीड़िता की मां के बयानों में मौजूद भारी विरोधाभासों और जिरह में उजागर हुई कमियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

साक्ष्यों के विश्लेषण की जिम्मेदारी: जस्टिस अंजारिया ने 42 पन्नों के फैसले में रेखांकित किया कि कानूनी अनुमान किसी भी जज को मामले के तथ्यों, वास्तविक परिस्थितियों और आरोपी के पक्ष में मौजूद ठोस साक्ष्यों का निष्पक्ष विश्लेषण करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकते।

9 अन्य कड़े कानूनों पर फैसले का सीधा प्रभाव

रिवर्स बर्डन वाले प्रावधान: इस अहम POCSO Act SC Verdict का असर केवल यौन अपराधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह फैसला उन सभी आठ अन्य प्रमुख आपराधिक कानूनों की कार्यप्रणाली को भी सीधे तौर पर प्रभावित करेगा जिनमें साबित करने का भार आरोपी पर होता है।

प्रभावित होने वाले प्रमुख कानून: शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि एनडीपीएस (NDPS) एक्ट, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, वन्यजीव संरक्षण कानून, फेमा (FEMA), कस्टम्स एक्ट और नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट जैसे कड़े कानूनों में भी अभियोजन की बेतुकी दलीलों को बिना परखे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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