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जिस बगावत से सत्ता के शिखर तक पहुंची थीं ममता बनर्जी, अब उसी बगावत और सिंबल विवाद के भंवर में फंसी TMC

सियासी बवंडर की आहट: ममता बनर्जी TMC के इतिहास में आज एक ऐसे अभूतपूर्व मोड़ पर खड़ी हैं, जहां सत्ता गंवाने के बाद खुद उनकी ही बनाई पार्टी में बगावत की चिंगारी भड़क चुकी है। 1998 में वाम मोर्चे को सीधी चुनौती देने के लिए जिस आक्रामकता से उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर नई राह चुनी थी, आज वही बगावती तेवर उनके अपने ही संगठन के भीतर उनके नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं।

ऐतिहासिक सफर की शुरुआत: ममता बनर्जी TMC की नींव रखने से पहले 1970 के दशक में कांग्रेस की छात्र राजनीति से उभरी थीं। वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव में दिग्गज वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर सीट से हराकर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर तहलका मचाया था। इसके बाद 1991 से लेकर 2009 तक उन्होंने कोलकाता दक्षिण सीट से लगातार जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक पकड़ को अपराजेय साबित किया।

सड़क से सत्ता तक का संघर्ष: ममता बनर्जी TMC को मजबूत करने के लिए 1990 के दशक में लगातार आंदोलनों की राह पर चलती रहीं। साल 2007 में सिंगुर और नंदीग्राम के ऐतिहासिक जनांदोलनों ने वाम मोर्चा सरकार की नींव हिला दी। इसी संघर्ष के दम पर उन्होंने 2011 में वामपंथियों के 34 साल लंबे शासन को उखाड़ फेंका और लगातार 15 वर्षों तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी रहीं।

आंतरिक कलह और ममता बनर्जी TMC का नया संकट

सत्ता परिवर्तन का गहरा झटका: ममता बनर्जी TMC के नेतृत्व में पिछले विधानसभा चुनाव में बड़ा झटका झेल चुकी हैं, जहां भाजपा 200 से अधिक सीटें जीतकर सरकार बनाने में सफल रही। तृणमूल कांग्रेस के 100 से कम सीटों पर सिमटते ही पार्टी के अंदर असंतोष खुलकर सतह पर आ गया और संगठन में सीधा विभाजन दिखाई देने लगा।

चुनाव चिह्न पर छिड़ी रार: पार्टी सिंबल पर संकट तब और गहरा गया जब बागी गुट ने पार्टी के नियंत्रण और आधिकारिक नाम पर दावा ठोक दिया। इसके चलते निर्वाचन आयोग ने विवाद के निपटारे तक तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और ‘जोड़ा घास फूल’ सिंबल को अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया है, जिसके खिलाफ कानूनी लड़ाई अब अदालत तक पहुंच गई है।

इतिहास का दिलचस्प विरोधाभास: सियासत का पूरा चक्र अब उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां 28 साल पहले जिस कांग्रेस को ममता ने छोड़ा था, आज भाजपा के खिलाफ मुकाबले में वही कांग्रेस उनकी स्वाभाविक सहयोगी बन रही है। नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देकर उन्होंने राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है।

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