रहस्यमयी पीले रंग का राज: Amir Khusrow Sakal Ban की धुन जब संजय लीला भंसाली की वेब सीरीज हीरामंडी में गूंजी, तो हर दर्शक इसके गहरे पीले रंग और सूफी मिजाज के सम्मोहन में बंध गया। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस गीत का नाता 14वीं सदी के एक गहरे दर्द और असीम भक्ति से जुड़ा हुआ है।
शोक में डूबे सूफी संत: गहरे अवसाद की दास्तान: महान सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने प्रिय भांजे के असामयिक निधन के बाद महीनों तक मौन और असहनीय शोक में डूबे रहे। अपने मुर्शिद को दुख के अथाह सागर में डूबता देख उनके सबसे चहेते मुरीद अमीर खुसरो अंदर से पूरी तरह बेचैन हो उठे थे।
Amir Khusrow Sakal Ban: वसंत पंचमी पर खिली भक्ति
सड़कों पर दिखा अनोखा दृश्य: एक जादुई संयोग: एक दिन वसंत पंचमी पर अमीर खुसरो ने हिंदू महिलाओं को पीले वस्त्र पहने और हाथों में सरसों के पीले फूल लिए गाते हुए देखा। पूछने पर महिलाओं ने बताया कि वे अपने आराध्य ईश्वर को प्रसन्न करने और रिझाने के लिए पीले फूल अर्पित कर रही हैं।
शिष्य का अनूठा समर्पण: जब गूंजा अमर तराना: खुसरो के मन में तुरंत विचार कौंधा कि उनके लिए तो ईश्वर का स्वरूप उनके गुरु ही हैं। उन्होंने तुरंत पीले वस्त्र धारण किए, सरसों के फूलों का गुच्छा थामा और Amir Khusrow Sakal Ban की कालजयी पंक्तियां ‘सकल बन फूल रही सरसों’ गाते हुए अपने पीर के सामने पहुंच गए।
इतिहास में अमर हुई मुस्कान: टूट गया गुरु का मौन: खुसरो का यह मासूम अंदाज, पीला रंग और सरसों के फूल देखकर निजामुद्दीन औलिया के चेहरे पर महीनों बाद मुस्कुराहट लौट आई। उसी ऐतिहासिक क्षण के साथ Amir Khusrow Sakal Ban का यह गीत और गुरु-शिष्य का यह पावन रिश्ता इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर हो गया।
आज भी जिंदा है रिवायत: गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल: आज 700 साल बाद भी दिल्ली स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर हर साल वसंत पंचमी धूमधाम से मनाई जाती है। दरगाह पर पीली चादर चढ़ाई जाती है और कव्वाल इसी सूफी गीत को गाकर भारतीय संस्कृति की साझा विरासत का जश्न मनाते हैं।






