युद्ध के मैदान में जल बाधाओं की सबसे बड़ी चुनौती
Sarvatra Bridge का असली महत्व तब समझ आता है जब रणभूमि में नदियां और नहरें सेना के टैंकों की राह रोक लेती हैं। दिसंबर 1971 में भारतीय सेना ने ढाका की ओर बिजली की गति से चढ़ाई की थी, जिसके बाद 16 दिसंबर को लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी ने ऐतिहासिक आत्मसमर्पण किया।
मेघना नदी का साहसी हेलीबोर्न ऑपरेशन प्राकृतिक और मानव निर्मित जल स्रोत विरोधी सेना को रोकने के लिए सबसे कठिन खाई का काम करते हैं। 1971 के संग्राम में पारंपरिक रूप से आगे बढ़ने के बजाय भारत ने मेघना नदी पर साहसी हेलीबोर्न हमला किया और सैनिकों को सीधे पार उतारा, साथ ही PT-76 एम्फीबियस टैंकों ने भी मोर्चा संभाला।
पंजाब और जम्मू मोर्चे पर नहरों का जाल पश्चिमी सीमा पर पंजाब और जम्मू क्षेत्रों में बारूदी सुरंगों और पानी के रास्तों का मिला-जुला सुरक्षा घेरा मौजूद रहता है। दुश्मन जानता है कि सेना को पानी पार करने के लिए एक संकीर्ण बिंदु पर जुटना होगा, जिससे हमलावर सेना पर भारी गोलाबारी का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
Sarvatra Bridge की अचूक तकनीक और मारक क्षमता
Sarvatra Bridge ऐसी विषम परिस्थितियों में सेना की बख्तरबंद गाड़ियों को बिना रुके तेजी से आगे बढ़ाने के लिए विकसित किया गया एक स्वदेशी मल्टी-स्पैन मोबाइल सिस्टम है। BEML 8×8 हाई मोबिलिटी वाहन पर तैयार यह प्रणाली मात्र 100 मिनट के भीतर 75 मीटर तक की दूरी पर पुल खड़ा कर सकती है।
70 टन का भार झेलने की बेजोड़ ताकत यह उन्नत ढांचा 70-टन क्लास ट्रैफिक के लिए तैयार किया गया है, जो 68 टन वजनी अर्जुन Mk-1A जैसे सबसे भारी बख्तरबंद टैंकों का वजन भी आसानी से वहन कर लेता है। इसमें मल्टी-स्टेज टेलीस्कोपिक लेग्स वाला पियर सिस्टम और डबल A-शेप ट्रेस्टल डिजाइन दिया गया है, जो स्वचालित हाइड्रोलिक्स से लॉक होकर जबरदस्त स्थिरता देता है।
इछोगिल नहर को पाटने में सक्षम लाहौर और भारत के बीच स्थित ऐतिहासिक बांबावली-रावी-बेदियन नहर (इछोगिल नहर) की चौड़ाई 45 मीटर है। Sarvatra Bridge 20 मिनट में 15 मीटर का एक स्पैन और ढाई घंटे में 75 मीटर का पूरा स्पैन खड़ा कर देता है, जिससे दुश्मन की कोई भी जल-रुकावट भारतीय टैंकों की रफ्तार नहीं थाम सकती।






